Battle of Sarnal

सरनाल का युद्ध वास्तव में एक बहुत ही छोटी से लड़ाई थी जो की अकबर के गुजरात पर हमले के बीच में हुआ था, १७५२ में, इसमें अकबर जीत गया था, इस युद्ध का अपना ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए भी क्युकी इस युद्ध में चंगेजखान के वंशज की सत्ता खत्म हो गयी थी और इस सरनाल के युद्ध का विस्तृत वर्णन अकबरनामा में दिया गया है जो अकबर के नवरत्नों में से एक Abu’l-Fazl ibn Mubarak (अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक ) ने पर्सियन भाषा में लिखी थी.

Quick Facts about Battle of Sarnal

NameBattle of Sarnal
In BetweenAkbar and Mirza
WhereSarnal Near Baroda, during Gurjarat war
When1572
Details inAkbarnama
ResultAkbar won

भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध

YearWar
327-26अलेक्जेंडर भारत पर हमला। पोरस Hydaspes की लड़ाई में हार (झेलम) 326 ई.पू.
305चंद्रगुप्त मौर्य ग्रीक राजा सेल्यूकस को हरा दिया।
216कलिंग युद्ध। अशोक द्वारा कलिंग की विजय।
सी। 155भारत की Menander के आक्रमण
सी। 90साका भारत पर आक्रमण
ईस्वी0
454पहले Huna आक्रमण
495दूसरी Huna आक्रमण
711-712मोहम्मद बिन कासिम के तहत सिंध की अरब आक्रमण
1000-27महमूद गजनवी भारत के 17 गुना पर हमला
1175-1206मुहम्मद गोरी के आक्रमणों। तराईन का प्रथम युद्ध। 1191 – पृथ्वी राज चौहान मोहम्मद गोरी धरा; Tarain की दूसरी लड़ाई, 1192 – मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया; Chandawar की लड़ाई 1194 – मोहम्मद गोरी कन्नौज के Jayachandra Gahadvala धरा।
1294अलाउद्दीन खिलजी देवगिरि के यादव राज्य पर हमला। डेक्कन का पहला तुर्की आक्रमण।
1398तैमूर भारत पर हमला। तुगलक सुल्तान महमूद शाह धरा; दिल्ली की बोरी
1526बाबर भारत पर हमला और पानीपत की पहली लड़ाई में पिछले लोदी सुल्तान इब्राहिम Lohi धरा।
1539-40Chusa या घाघरा (1539) और कन्नौज या गंगा (1540) की लड़ाई में जो शेरशाह हुमायूं को हरा दिया।
1545लड़ाई शेरशाह सूरी की कालिंजर और मौत की (घेराबंदी)।
1556पानीपत की दूसरी लड़ाई। अकबर हेमू को हरा दिया।
1565Rakatakshasi-Tangadi (Talikota) की लड़ाई में जो राजा सदाशिव राया और उनके रीजेंट राम राया के अंतर्गत Vijanagar के साम्राज्य की ताकतों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, और बीदर के दक्षिणी राज्यों की संघि बलों द्वारा कराई हैं।
1576हल्दीघाटी के युद्ध, अकबर मेवाड़ के राणा प्रताप को हरा दिया।
1632-33शाहजहां ने अहमदनगर को जीत।
1658Dharmat (1658 अप्रैल-मई) और Samugarh की लड़ाई (8 जून 1658)। दारा शिकोह, शाहजहां के elest बेटे औरंगजेब द्वारा हरा दिया।
1665शिवाजी राजा जय सिंह और पुरन्धर की संधि से पराजित किया।
1739नादिर शाह द्वारा भारत के आक्रमण।
1746सबसे पहले कर्नाटक युद्ध।
1748-54दूसरा कर्नाटक युद्ध।
1756-63तीसरा कर्नाटक युद्ध।
1757प्लासी का युद्ध। क्लाइव से हार बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला।
1760अंग्रेजी सर तहत आयर Coote लल्ली के तहत फ्रांसीसी पराजित जिसमें Wandiwash, की लड़ाई।
1762पानीपत की तीसरी लड़ाई। अहमद शाह अब्दाली से हार मराठों।
1764बक्सर का युद्ध। (मुनरो के तहत) अंग्रेजी मीर कासिम, बंगाल के नवाब और नवाब शुजा-उद-दौला अवध के पराजित किया।
1767-69प्रथम मैसूर युद्ध।
1774ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा समर्थित Rohillas और अवध के नवाब के बीच रोहिल्ला युद्ध।
1775-82प्रथम मराठा युद्ध
1780-82मराठा युद्ध
1780-84दूसरा मैसूर युद्ध
1792तीसरा मैसूर युद्ध
1799चौथे मैसूर युद्ध, टीपू सुल्तान की हार और मृत्यु
1802-04दूसरा मराठा युद्ध
1817-18तीसरा मराठा युद्ध
1845-46पहले सिख युद्ध
1846अंग्रेजी और सिखों के बीच अलीवाह की लड़ाई। सिखों हार गए।
1848-49दूसरा सिख युद्ध और ब्रिटिश भारत के लिए पंजाब के विलय।
18571857 के विद्रोह (भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम)

पानीपत की लड़ाईया

पानीपत हरियाणा राज्य का एक नगर है जो की अपने आप में बहुत सा इतिहास संजोय हुए है, भारत के राज्यों के इतिहास में पानीपत का अपना विशेष महत्त्व है, इस स्थान से जहा एक तरफ मुग़ल साम्राज्य की नीव पड़ी वही दूसरी तरफ हिन्दू राष्ट्र का सम्मान स्वप्न संजोय हुए मराठो का अस्तित्व ही दाव पर लग गया था।

पानीपथ में कुछ 3 लड़ाईया हुयी है, जिनका संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में है, इसके अलाबा हम करने और और परिणाम पर भी विचार करेंगे।

क्रम संख्यापानीपत का युद्ध कब हुआ किनके बीच
1पानीपत का प्रथम युद्ध21 अप्रैल 1526बाबर एवं इब्राहिम लोदी
2पानीपत का द्वितीय युद्ध5 नवंबर1556बैरम ख़ाँ(अकबर का सेनापति ) एवं हेमू(आदिलशाह सूर का सेनापति )
3पानीपत का तृतीय युद्ध14 जनवरी 1761(मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली)

पानीपत के प्रथम युद्ध के कारण

सिकंदर लोधी की २१ नवंबर, १५१७ में मृत्यु के बाद उसका पता इब्राहिम लोधी दिल्ली की गद्दी पर बैठा और बैठते ही उसने अपने पिता के विश्वासपात्र दरबारियों को हटा कर अपने बफादार और विश्वासपात्र लोगो को दरबार में विशेष उच्च स्थान दे दिया जो पुराने बफादारो को बहुत ही बुरा लगा और इब्राहिम लोधी को सबक सिखाने के लिए षड्यंत्र रचने लगे।

इब्राहीम से असंतुष्ट दरबारी सरदारों में तत्कालीन पंजाब का शासक ‘दौलत ख़ाँ लोदी’ एवं इब्राहीम लोदी के चाचा ‘आलम ख़ाँ’ भी थे, इन दोनों ने ही काबुल के तैमूर वंशी शासक बाबर को इब्राहिम लोधी पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया। बाबर ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और फिर 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और बाबर के मध्य हुए भयानक संघर्ष हुआ।

पानीपत के प्रथम युद्ध का सबसे प्रमुख कारण दरबारी सरदारों का इब्राहिम लोधी से असंतुस्ट होकर बाबर को उसे सबक सिखाने के लिए बुलाना है।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

इस युद्ध में इब्राहिम के सगे सम्बन्धिओ ने भी साथ नहीं दिया, वल्कि उन्होंने साथ देने वाले सरदारों का भी मनोबल तोड़ने की कोशिश की, जिसका परिणाम हुआ की इब्राहिम इस युद्ध में बुरी तरह हार गया और उसकी हत्या कर दी गयी, साथ ही यह युद्ध भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव का आधार भी बन गया, क्युकी इस युद्ध के बाद बाबर समझ गया था भारत में जिस पर हमला होगा सिर्फ वही सक्रिय होगा बाकि सब अपने काम में व्यक्त रहेंगे, इस युद्ध में बाबर की १३००० की फ़ौज इब्राहिम की १ लाख से ज्यादा फ़ौज पर भरी पड़ी, क्यों और कैसे पड़ी ये तो आज भी एक रहस्य.

पानीपत के द्वितीय युद्ध के कारण

पानीपत का दूसरा युद्ध हिन्दू राजा वीर हेमचंद जिसे हेमू भी कहते है और अकबर के बीच हुआ था, इस युद्ध से कुछ समय पूर्व तक हेमचंद आदिल की सेना में सेनाधिपति था.

1553-1556 के दौरान हिन्दू राजा वीर हेमचंद ने सेना के प्रधान मंत्री व प्रधान सेनापति के रूप में पंजाब से बंगाल तक 22 युद्ध जीते थे। जब जनवरी 1556 में हुमायूं की दिल्ली में मौत हुयी उस समय, हेमू बंगाल में था जहाँ वह एक युद्ध में बंगाल के तत्कालीन शासक मुहम्मद शाह को मार कर विद्रोह पर काबू पाने में लगा हुआ था, इस समय तक हेमू अफगानी शासक आदिलशाह के अधीन था।

लेकिन जब हुमायु की मृत्यु के बाद हेमू ने दिल्ली कूंच किया बीच में आगरा पर भी हमला किया तो वह का सेनानायक बिना युद्ध के ही भाग गया और दिल्ली में वर्तमान तुगलकाबाद के पास की लड़ाई में 6 अक्टूबर को तत्कालीन मुगल सेना को हरा दिया। लगभग 3,000 मुगलों को मार डाला। मुगल कमांडर तर्दी बेग दिल्ली को हेमू के कब्जे में छोड़, बचे खुचे सैनिकों के साथ भाग गया। अगले दिन दिल्ली के पुराना किला में हेमू ने अपना राज्याभिषेक करवा कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

दिल्ली और आगरा के पतन से कलानौर में मुगल परेशान हो उठे और अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हेमू पर हमला कर दिया, मजे की बात ये थी की अकबर और उनके अभिभावक बैरम खान ने इस युद्ध में भाग नहीं लिए, लेकिन अतिउत्साही हेमू ने खुद मोर्चा संभाल लिया था।

पानीपत के इस दूसरे युद्ध का वास्तविक कारण था भारत से मुग़लिया और अफगानी सल्तनत का सफाया और हिन्दू राजा का प्रभावशाली होना, जो की तत्कालीन अकबर के मुस्लिम सैनिको को जिहाद के नाम पर उकसाने के लिए काफी था, यही बैरमखाँ ने किया, यही बाबर ने भी पहले पानीपत की लड़ाई के समय २१ अप्रैल १५२६ में किया था।

पानीपत के दूसरे युद्ध या लड़ाई का परिणाम

पानीपत की दूसरी लड़ाई जहा अतिउत्साही हेमचंद और बेराम खान की सूझ बुझ की थी वही दूसरी तरफ सैनिको और जेहादिओं के बीच थी, सैनिक का लड़ रहा लेकिन उसे मरने के अतिरक्त कोई भी भय नहीं था जबकि अकबर के सैनिक लड़ रहे थे इस्लाम के लिए इसलिए उनकी आक्रामकता बहुत ज्यादा थी, दूसरे हेमू के गिरते ही हेमू की सेना का मनोबल टूट गया जबकि अकबर की सेना का मनोबल युद्ध क्षेत्र से ५ मील दूर सुरक्षित था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई के परिणाम बहुत भयानक हुए, हेमू को बहुत ही कायराना तरीके से मारा गया, उसका कटा हुआ सिर काबुल के दिल्ली दरवाजा पर प्रदर्शन के लिए भेजा गया था। उसके धड़ दिल्ली के पुराना किला के बाहर फांसी पर लटका दिया गया था ताकि लोगों के दिलों में डर पैदा हो। बैरम खान ने विरोधियों की सामूहिक हत्या का आदेश दिया जो कई वर्षों तक जारी रहा। हेमू के सभी रिश्तेदारों और करीबी अफगान समर्थकों को पकड़ लिया गया और उनमें से कईयों को मौत की सजा दी गई। कई स्थानों पर उन कटे हुए सिरों से मीनारें भी बनवाई गईं । हेमू का 82 वर्षीय पिता, जो अलवर भाग गया था, छह महीने के बाद उसे पकड़ लिया गया और उसे मौत की सजा दे दी गई।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के कारण

14 जनवरी 1761 को वर्तमान हरियाणा मे स्थित पानीपत के मैदान मे हुआ। इस युद्ध मे दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया।

शिवाजी महाराज ने जहां एक तरफ बिखरी हुयी मराठा शक्ति को एकत्रित किया वही दूसरी तरफ उनके वंशजो ने मुघलो से लड़ते लड़ते रामपि साम्राज्य विस्तार की नीति के चलते हिन्दू राजाओ को भी कुचलना शुरू कर दिया, मराठा शक्ति बहुत तेजी से बढ़ रही थी पुरे उत्तर भारत में मराठो ने सबको चौथ, सरदेशमुखी इत्यादि देने को विवस कर दिया था, मराठो के इसी आतंक से दुखी होकर सबने जिनमे जयपुर के राजा माधो सिंह, अवध के नबाब सुजाउद्दोला, रोहिल्ला सरदार नजीबुद्दोला शामिल थे ने अहमद शाह दुर्रानी को बुलाया था।

अहमदशाह दुर्रानी को सिर्फ मराठो से भय १७३९ में नादिरशाह की हार के बाद सिर्फ इतना था की पेशवर मराठो के कब्जे में है और मराठे कभी भी अफगानिस्तान पर हमला कर सकते है, इसके अलाबा उसकी मराठो से कोई दुश्मनी नहीं, तीसरी लड़ाई का सबसे प्रमुख कारन था मराठो की विस्तारवादी निति से हिन्दू राजाओ और अन्य राजाओ का लुटम पाट से दुखी होना।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के परिणाम

पानीपत के तीसरे युद्ध का परिणाम बहुत ही बुरा और भयानक रहा, बहुत से मराठा सरदार मारे गए, अफगानी सेनिको ने क्रूरता की सारी हदे पार कर दी, जैसे सदाशिव राव भाऊ का गला काटकर अपने साथ ले गए, तोपची इब्राहिम गर्दी को बुरी तरह मारा, मराठो के साथ ४०००० तीर्थ यात्रिओ को भी मार डाला, इस युद्ध के बाद मराठा परिवार के प्रत्येक घर में कोई न कोई वीरगति को प्राप्त हुआ था।