Battle of Sarnal

सरनाल का युद्ध वास्तव में एक बहुत ही छोटी से लड़ाई थी जो की अकबर के गुजरात पर हमले के बीच में हुआ था, १७५२ में, इसमें अकबर जीत गया था, इस युद्ध का अपना ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए भी क्युकी इस युद्ध में चंगेजखान के वंशज की सत्ता खत्म हो गयी थी और इस सरनाल के युद्ध का विस्तृत वर्णन अकबरनामा में दिया गया है जो अकबर के नवरत्नों में से एक Abu’l-Fazl ibn Mubarak (अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक ) ने पर्सियन भाषा में लिखी थी.

Quick Facts about Battle of Sarnal

NameBattle of Sarnal
In BetweenAkbar and Mirza
WhereSarnal Near Baroda, during Gurjarat war
When1572
Details inAkbarnama
ResultAkbar won

World War in Hindi

अभी तक सिर्फ २ विश्व युद्ध हुए है, प्रथम 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चला जो की युरोप, अफ़्रीका और मध्य पूर्व (आंशिक रूप में चीन और प्रशान्त द्वीप समूह) में लड़ा गया था। जबकि दूसरा विश्व युद्ध 1 सितंबर 1939 – 2 सितम्बर 1945 (6 वर्ष और 1 दिन) चला इससमे ७० देशों ने भाग लिया था , और यह युद्ध यूरोप, प्रशांत, अटलांटिक, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, मध्य पूर्व, भूमध्यसागर, उत्तरी अफ्रीका और हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका, संक्षेप में उत्तर और दक्षिण अमेरिका में लड़ा गया था।

प्रथम विश्व युद्ध के कारण

मानव सभ्यता में हर युग में युद्ध का कारन सिर्फ एक ही रहा है, वर्चस्व, फिर वो चाहे धन का हो पद का हो या फिर व्यापर के लिए हो, २०वी सदी का प्रारंभिक समय पुरे विश्व में औधोगिक क्रांति का दौर था, नयी नयी मशीने बन रही थी जिनके लिए ज्यादा शायद बहुत ज्यादा कच्चा माल सस्ते दामों में चाहिए था, क्युकी मशीनों से काम आसान हो रहा था, रोजगार कम हो रहे थे, जरूरते बढ़ रही थी, भवन निर्माण और अन्य फ़ैक्टरिओ के कारन कच्चे माल के लिए भूमि कम पड़ रही थी, इसलिए हर समृद्ध देश विशेषकर यूरोप के देश औपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहे थे, एक उपनिवेश से दूसरे देश को या तो भगा रहे थे या दें कर रहे थे।

वर्चस्व की भावना इस तरह बढ़ती जा रही थी की हर देश दूसरे देश के साथ लड़ने को आमादा था, बस किसी तात्कालिक कारन हो खोज रहा था, और इसका तात्कालिक कारन बना जो की बारूद में पलीते के तरह काम कर गया।

ऑस्ट्रिया के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्चड्युक फर्डिनेंड और उनकी पत्नी का वध इस युद्ध का तात्कालिक कारण था, जब दोनों दंपत्ति धूमने के लिए सेराजेवो गए तो कुछ लोगो ने जो की सर्बिआ विद्रोहिओ का अम्युदय था उसने 28 जून 1914 इस दंपत्ति की हत्या कर दी, और इस कारन एक माह के बाद ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध घोषित किया।

इसके बाद से शुरू होता है की कौन सा देश किसकी साहित्य karega, कौन किससे लड़ेगा, रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन ने सर्बिया की सहायता की और जर्मनी ने आस्ट्रिया की। अगस्त में जापान, ब्रिटेन आदि की ओर से और कुछ समय बाद उस्मानिया, जर्मनी की ओर से, युद्ध में शामिल हुए।

प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम

यह युद्ध लगभग ५२ महीने चला, विश्व युद्ध ख़त्म होते-होते चार बड़े साम्राज्य रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी (हैप्सबर्ग) और उस्मानिया ढह गए। यूरोप की सीमाएँ फिर से निर्धारित हुई और अमेरिका निश्चित तौर पर एक ‘महाशक्ति ‘ बन कर उभरा।

इस युद्ध के दौरान अंदाज़न एक करोड़ लोगों की जान गई और इससे दोगुने घायल हो गए। इसके अलावा बीमारियों और कुपोषण जैसी घटनाओं से भी लाखों लोग मरे।

दूसरे विश्व युद्ध के प्रमुख कारण

अगर हम कहे की दूसरे विश्व युद्ध का आधार प्रथम युद्ध था तो ये कहना एकदम गलत नहीं होगा, क्युकी पहले विश्वयुद्ध में जीते हुए देशो का व्यव्हार हारे हुए देशो के नागरिको के साथ बहुत ही बर्बरता पूर्ण था, प्रथम विश्वयुद्ध के विजसता जैसे फ्रांस, बेल्जियम, इटली, ग्रीस और रोमानिया इत्यादि देशो ने बहुत से विघटित हुए राष्ट्रों के भूभाग को प्राप्त कर किये, केन्द्रीय शक्तियों जैसे ऑस्ट्रिया-हंगरी, जर्मनी, बुल्गारिया, रूसी एवं ओटोमन साम्राज्य का विघटन और काफी कुछ हद तक पतन हो गया था।

द्व्तीय विश्वयुद्ध के लिए सबसे अधिक अगर किसी को जिम्मेदार माना जाता है तो वो है अडोल्फ हिटलर को, लेकिन वास्तव में उसे जितना क्रूर और सनकी तत्कालीन ब्रिटिश और अमेरिकी लेखकों ने साबित किया था शायद वो उतना नहीं रहा होगा अन्यथा भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री सुभास चंद्र बोस उससे शायद कभी हाथ न मिलाते

वास्तव में प्रथम विश्वयुद्ध के विजेता राष्ट्रों की संकुचित नीति के कारण ही स्वाभिमानी जर्मन राष्ट्र को हिटलर के नेतृत्व में आक्रमक नीति अपनानी पड़ी, हिटलर जर्मन सेना में में था जब १९१८ में वह घायल होकर अस्पताल में भर्ती हुआ और उसकी वीरता एवं साहस के लिए आर्यन क्रॉस जैसे पदक प्राप्त हुए थे, वह स्वयं को आर्य अर्थात श्रेष्ठ मानता था और साथ ही यह भी मानता था की आर्य ही पूरी दुनिआ पर राज्या करने के लिए उत्तम लोग है।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कुछ राज्यों ने एक दूसरे के साथ गुप्त संधिया की थी, जिनके आधार पर वे एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे, और किसी एक पर अन्य राज्य द्वारा हमला दूसरे राज्य पर भी माना जायेगा, और हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी के सेनिको का मनोबल बहुत बढ़ रहा था और इसका परिणाम ये हुआ की जर्मनी सेनिको ने जो की हिटलर ने नेतृत्त्व में नाजी कहे जाते थे, ने ०१ सितम्बर १९३९ को पोलेंड पर हमला कर दिया, लेकिन पोलेंड के मित्र राष्ट्र फ़्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

फ़्रांस जैसी शक्ति का इस दूसरे विश्व युद्ध में शामिल होते ही इग्लेंड एवं अन्य देश जो ब्रिटिश के अधीन थी इसमें स्वतः ही शामिल हो गए थे, इसके बाद जापान, इटली और अन्य देश भी शामिल होते रहे।

कहा जाता है की इस दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने सबसे पहले प्रशान्त महासागर में युरोपीय देशों के आधिपत्य वाले क्षेत्रों तथा संयुक्त राज्य अमेरीका के पर्ल हार्बर पर हमला बोल दिया और जल्द ही पश्चिमी प्रशान्त पर क़ब्ज़ा बना लिया।

कई स्थानों पर जर्मनी की हार, जापान की हार इटली की हार से होते हुए विश्व युद्ध अपनी आखरी स्तर पर था तभी अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर ६ अगस्त और नागासाकी पर ९ अगस्त १९४५ को परमाणु बम्ब गिरा कर समस्त मानवजाति को शर्मशार कर दिया था, एक संधि जिसका नाम कुबेक संधि उसके अनुसार इस बम्ब को गिराने में ब्रिटेन की भी सहमति थी।

दूसरे विश्व युद्ध के परिणाम

दूसरे विश्वयुद्ध के परिणाम बहुत ही बुरे और भायवह थे, जापान के हिरोशिम और नागासाकी जैसे दो नगरों पर परमाणु बम्ब का गिरना और उसके रेडिएशन का बाद के कई वर्षो तक नवजात शिशुओं पर असर दिखना सबसे बुरा अंत था, राजनैतिक रूप से नाजी जर्मनी का पतन, जापानी और इतालवी साम्राज्यों का पतन, राष्ट्र संघ का विघटन, संयुक्त राष्ट्र का निर्माण, महाशक्तियों के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ का उत्थान और सबसे विशेष हर राष्ट्र के दूर के प्रति शीत युद्ध की शुरुआत।

यही था दूसरे विश्वयुद्ध का वास्तविक अंत।

भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध

YearWar
327-26अलेक्जेंडर भारत पर हमला। पोरस Hydaspes की लड़ाई में हार (झेलम) 326 ई.पू.
305चंद्रगुप्त मौर्य ग्रीक राजा सेल्यूकस को हरा दिया।
216कलिंग युद्ध। अशोक द्वारा कलिंग की विजय।
सी। 155भारत की Menander के आक्रमण
सी। 90साका भारत पर आक्रमण
ईस्वी0
454पहले Huna आक्रमण
495दूसरी Huna आक्रमण
711-712मोहम्मद बिन कासिम के तहत सिंध की अरब आक्रमण
1000-27महमूद गजनवी भारत के 17 गुना पर हमला
1175-1206मुहम्मद गोरी के आक्रमणों। तराईन का प्रथम युद्ध। 1191 – पृथ्वी राज चौहान मोहम्मद गोरी धरा; Tarain की दूसरी लड़ाई, 1192 – मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान को हरा दिया; Chandawar की लड़ाई 1194 – मोहम्मद गोरी कन्नौज के Jayachandra Gahadvala धरा।
1294अलाउद्दीन खिलजी देवगिरि के यादव राज्य पर हमला। डेक्कन का पहला तुर्की आक्रमण।
1398तैमूर भारत पर हमला। तुगलक सुल्तान महमूद शाह धरा; दिल्ली की बोरी
1526बाबर भारत पर हमला और पानीपत की पहली लड़ाई में पिछले लोदी सुल्तान इब्राहिम Lohi धरा।
1539-40Chusa या घाघरा (1539) और कन्नौज या गंगा (1540) की लड़ाई में जो शेरशाह हुमायूं को हरा दिया।
1545लड़ाई शेरशाह सूरी की कालिंजर और मौत की (घेराबंदी)।
1556पानीपत की दूसरी लड़ाई। अकबर हेमू को हरा दिया।
1565Rakatakshasi-Tangadi (Talikota) की लड़ाई में जो राजा सदाशिव राया और उनके रीजेंट राम राया के अंतर्गत Vijanagar के साम्राज्य की ताकतों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, और बीदर के दक्षिणी राज्यों की संघि बलों द्वारा कराई हैं।
1576हल्दीघाटी के युद्ध, अकबर मेवाड़ के राणा प्रताप को हरा दिया।
1632-33शाहजहां ने अहमदनगर को जीत।
1658Dharmat (1658 अप्रैल-मई) और Samugarh की लड़ाई (8 जून 1658)। दारा शिकोह, शाहजहां के elest बेटे औरंगजेब द्वारा हरा दिया।
1665शिवाजी राजा जय सिंह और पुरन्धर की संधि से पराजित किया।
1739नादिर शाह द्वारा भारत के आक्रमण।
1746सबसे पहले कर्नाटक युद्ध।
1748-54दूसरा कर्नाटक युद्ध।
1756-63तीसरा कर्नाटक युद्ध।
1757प्लासी का युद्ध। क्लाइव से हार बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला।
1760अंग्रेजी सर तहत आयर Coote लल्ली के तहत फ्रांसीसी पराजित जिसमें Wandiwash, की लड़ाई।
1762पानीपत की तीसरी लड़ाई। अहमद शाह अब्दाली से हार मराठों।
1764बक्सर का युद्ध। (मुनरो के तहत) अंग्रेजी मीर कासिम, बंगाल के नवाब और नवाब शुजा-उद-दौला अवध के पराजित किया।
1767-69प्रथम मैसूर युद्ध।
1774ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा समर्थित Rohillas और अवध के नवाब के बीच रोहिल्ला युद्ध।
1775-82प्रथम मराठा युद्ध
1780-82मराठा युद्ध
1780-84दूसरा मैसूर युद्ध
1792तीसरा मैसूर युद्ध
1799चौथे मैसूर युद्ध, टीपू सुल्तान की हार और मृत्यु
1802-04दूसरा मराठा युद्ध
1817-18तीसरा मराठा युद्ध
1845-46पहले सिख युद्ध
1846अंग्रेजी और सिखों के बीच अलीवाह की लड़ाई। सिखों हार गए।
1848-49दूसरा सिख युद्ध और ब्रिटिश भारत के लिए पंजाब के विलय।
18571857 के विद्रोह (भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम)

पानीपत की लड़ाईया

पानीपत हरियाणा राज्य का एक नगर है जो की अपने आप में बहुत सा इतिहास संजोय हुए है, भारत के राज्यों के इतिहास में पानीपत का अपना विशेष महत्त्व है, इस स्थान से जहा एक तरफ मुग़ल साम्राज्य की नीव पड़ी वही दूसरी तरफ हिन्दू राष्ट्र का सम्मान स्वप्न संजोय हुए मराठो का अस्तित्व ही दाव पर लग गया था।

पानीपथ में कुछ 3 लड़ाईया हुयी है, जिनका संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में है, इसके अलाबा हम करने और और परिणाम पर भी विचार करेंगे।

क्रम संख्यापानीपत का युद्ध कब हुआ किनके बीच
1पानीपत का प्रथम युद्ध21 अप्रैल 1526बाबर एवं इब्राहिम लोदी
2पानीपत का द्वितीय युद्ध5 नवंबर1556बैरम ख़ाँ(अकबर का सेनापति ) एवं हेमू(आदिलशाह सूर का सेनापति )
3पानीपत का तृतीय युद्ध14 जनवरी 1761(मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली)

पानीपत के प्रथम युद्ध के कारण

सिकंदर लोधी की २१ नवंबर, १५१७ में मृत्यु के बाद उसका पता इब्राहिम लोधी दिल्ली की गद्दी पर बैठा और बैठते ही उसने अपने पिता के विश्वासपात्र दरबारियों को हटा कर अपने बफादार और विश्वासपात्र लोगो को दरबार में विशेष उच्च स्थान दे दिया जो पुराने बफादारो को बहुत ही बुरा लगा और इब्राहिम लोधी को सबक सिखाने के लिए षड्यंत्र रचने लगे।

इब्राहीम से असंतुष्ट दरबारी सरदारों में तत्कालीन पंजाब का शासक ‘दौलत ख़ाँ लोदी’ एवं इब्राहीम लोदी के चाचा ‘आलम ख़ाँ’ भी थे, इन दोनों ने ही काबुल के तैमूर वंशी शासक बाबर को इब्राहिम लोधी पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया। बाबर ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया और फिर 21 अप्रैल 1526 को पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और बाबर के मध्य हुए भयानक संघर्ष हुआ।

पानीपत के प्रथम युद्ध का सबसे प्रमुख कारण दरबारी सरदारों का इब्राहिम लोधी से असंतुस्ट होकर बाबर को उसे सबक सिखाने के लिए बुलाना है।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

इस युद्ध में इब्राहिम के सगे सम्बन्धिओ ने भी साथ नहीं दिया, वल्कि उन्होंने साथ देने वाले सरदारों का भी मनोबल तोड़ने की कोशिश की, जिसका परिणाम हुआ की इब्राहिम इस युद्ध में बुरी तरह हार गया और उसकी हत्या कर दी गयी, साथ ही यह युद्ध भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव का आधार भी बन गया, क्युकी इस युद्ध के बाद बाबर समझ गया था भारत में जिस पर हमला होगा सिर्फ वही सक्रिय होगा बाकि सब अपने काम में व्यक्त रहेंगे, इस युद्ध में बाबर की १३००० की फ़ौज इब्राहिम की १ लाख से ज्यादा फ़ौज पर भरी पड़ी, क्यों और कैसे पड़ी ये तो आज भी एक रहस्य.

पानीपत के द्वितीय युद्ध के कारण

पानीपत का दूसरा युद्ध हिन्दू राजा वीर हेमचंद जिसे हेमू भी कहते है और अकबर के बीच हुआ था, इस युद्ध से कुछ समय पूर्व तक हेमचंद आदिल की सेना में सेनाधिपति था.

1553-1556 के दौरान हिन्दू राजा वीर हेमचंद ने सेना के प्रधान मंत्री व प्रधान सेनापति के रूप में पंजाब से बंगाल तक 22 युद्ध जीते थे। जब जनवरी 1556 में हुमायूं की दिल्ली में मौत हुयी उस समय, हेमू बंगाल में था जहाँ वह एक युद्ध में बंगाल के तत्कालीन शासक मुहम्मद शाह को मार कर विद्रोह पर काबू पाने में लगा हुआ था, इस समय तक हेमू अफगानी शासक आदिलशाह के अधीन था।

लेकिन जब हुमायु की मृत्यु के बाद हेमू ने दिल्ली कूंच किया बीच में आगरा पर भी हमला किया तो वह का सेनानायक बिना युद्ध के ही भाग गया और दिल्ली में वर्तमान तुगलकाबाद के पास की लड़ाई में 6 अक्टूबर को तत्कालीन मुगल सेना को हरा दिया। लगभग 3,000 मुगलों को मार डाला। मुगल कमांडर तर्दी बेग दिल्ली को हेमू के कब्जे में छोड़, बचे खुचे सैनिकों के साथ भाग गया। अगले दिन दिल्ली के पुराना किला में हेमू ने अपना राज्याभिषेक करवा कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी।

दिल्ली और आगरा के पतन से कलानौर में मुगल परेशान हो उठे और अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हेमू पर हमला कर दिया, मजे की बात ये थी की अकबर और उनके अभिभावक बैरम खान ने इस युद्ध में भाग नहीं लिए, लेकिन अतिउत्साही हेमू ने खुद मोर्चा संभाल लिया था।

पानीपत के इस दूसरे युद्ध का वास्तविक कारण था भारत से मुग़लिया और अफगानी सल्तनत का सफाया और हिन्दू राजा का प्रभावशाली होना, जो की तत्कालीन अकबर के मुस्लिम सैनिको को जिहाद के नाम पर उकसाने के लिए काफी था, यही बैरमखाँ ने किया, यही बाबर ने भी पहले पानीपत की लड़ाई के समय २१ अप्रैल १५२६ में किया था।

पानीपत के दूसरे युद्ध या लड़ाई का परिणाम

पानीपत की दूसरी लड़ाई जहा अतिउत्साही हेमचंद और बेराम खान की सूझ बुझ की थी वही दूसरी तरफ सैनिको और जेहादिओं के बीच थी, सैनिक का लड़ रहा लेकिन उसे मरने के अतिरक्त कोई भी भय नहीं था जबकि अकबर के सैनिक लड़ रहे थे इस्लाम के लिए इसलिए उनकी आक्रामकता बहुत ज्यादा थी, दूसरे हेमू के गिरते ही हेमू की सेना का मनोबल टूट गया जबकि अकबर की सेना का मनोबल युद्ध क्षेत्र से ५ मील दूर सुरक्षित था।

पानीपत की दूसरी लड़ाई के परिणाम बहुत भयानक हुए, हेमू को बहुत ही कायराना तरीके से मारा गया, उसका कटा हुआ सिर काबुल के दिल्ली दरवाजा पर प्रदर्शन के लिए भेजा गया था। उसके धड़ दिल्ली के पुराना किला के बाहर फांसी पर लटका दिया गया था ताकि लोगों के दिलों में डर पैदा हो। बैरम खान ने विरोधियों की सामूहिक हत्या का आदेश दिया जो कई वर्षों तक जारी रहा। हेमू के सभी रिश्तेदारों और करीबी अफगान समर्थकों को पकड़ लिया गया और उनमें से कईयों को मौत की सजा दी गई। कई स्थानों पर उन कटे हुए सिरों से मीनारें भी बनवाई गईं । हेमू का 82 वर्षीय पिता, जो अलवर भाग गया था, छह महीने के बाद उसे पकड़ लिया गया और उसे मौत की सजा दे दी गई।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के कारण

14 जनवरी 1761 को वर्तमान हरियाणा मे स्थित पानीपत के मैदान मे हुआ। इस युद्ध मे दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया।

शिवाजी महाराज ने जहां एक तरफ बिखरी हुयी मराठा शक्ति को एकत्रित किया वही दूसरी तरफ उनके वंशजो ने मुघलो से लड़ते लड़ते रामपि साम्राज्य विस्तार की नीति के चलते हिन्दू राजाओ को भी कुचलना शुरू कर दिया, मराठा शक्ति बहुत तेजी से बढ़ रही थी पुरे उत्तर भारत में मराठो ने सबको चौथ, सरदेशमुखी इत्यादि देने को विवस कर दिया था, मराठो के इसी आतंक से दुखी होकर सबने जिनमे जयपुर के राजा माधो सिंह, अवध के नबाब सुजाउद्दोला, रोहिल्ला सरदार नजीबुद्दोला शामिल थे ने अहमद शाह दुर्रानी को बुलाया था।

अहमदशाह दुर्रानी को सिर्फ मराठो से भय १७३९ में नादिरशाह की हार के बाद सिर्फ इतना था की पेशवर मराठो के कब्जे में है और मराठे कभी भी अफगानिस्तान पर हमला कर सकते है, इसके अलाबा उसकी मराठो से कोई दुश्मनी नहीं, तीसरी लड़ाई का सबसे प्रमुख कारन था मराठो की विस्तारवादी निति से हिन्दू राजाओ और अन्य राजाओ का लुटम पाट से दुखी होना।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के परिणाम

पानीपत के तीसरे युद्ध का परिणाम बहुत ही बुरा और भयानक रहा, बहुत से मराठा सरदार मारे गए, अफगानी सेनिको ने क्रूरता की सारी हदे पार कर दी, जैसे सदाशिव राव भाऊ का गला काटकर अपने साथ ले गए, तोपची इब्राहिम गर्दी को बुरी तरह मारा, मराठो के साथ ४०००० तीर्थ यात्रिओ को भी मार डाला, इस युद्ध के बाद मराठा परिवार के प्रत्येक घर में कोई न कोई वीरगति को प्राप्त हुआ था।

Trimbakeshwar Temple Nashik Maharashtra

Trimbakeshwar Temple History in Hindi

त्रिंबकेश्वर या त्र्यंबकेश्वर में बना हुआ भगवान शिव का विशाल त्र्यंबकेश्‍वर मंदिर काले पत्‍थरों से बना है, महर्षि गौतम जी पर भगवान शिव की कृपा के कारन स्वतः प्रकट हुआ मंदिर है, एक बार महर्षि पर अन्य लोगो ने गौ हत्या का मिथ्या आरोप लगाकर छल किया जिससे स्वयं को शुद्ध करने के लिए महात्मा अगस्त ने घनघोर तप किया और भगवान के दर्शन होने पर उनसे इस धरा पर गंगा माता के अवतरण की प्रार्थना की, जिस पर भगवान शिव ने तथास्तु भी कह दिया .

किन्तु फिर माता गंगा की प्रार्थना पर भगवान ने स्वयं भी यहाँ पर ज्योतिर्लिंग स्वरूप में निवास करना स्वीकार किया, यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह कल्याणकारी शिवलिंगों में से एक है।
मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्डे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। शिवपुराण के ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिये चौड़ी-चौड़ी सात सौ सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इन सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद ‘रामकुण्ड’ और ‘लष्मणकुण्ड’ मिलते हैं और शिखर के ऊपर पहुँचने पर गोमुख से निकलती हुई भगवती गोदावरी के दर्शन होते हैं।

Facts about Trimbakeshwar Temple Nashik

Nameत्रयम्बकेश्वर मंदिर(Trimbakeshwar Temple
LocationTrimbak
City Trimbakeshwar
DistrictNashik
StateMaharashtra
CountryIndia
ContinentAsia
Built in500 A.D
Built by (Re-Built)Balaji Baji Rao in 1755
Coordindates19°55′56″N 73°31′51″E
ArchitectureIndus Aryashalai
HeightAbout 1000 metres from the Sea Level
Nearest Railway StationNashik
Nearest AirportOzar Airport, Nashik

त्र्यंबकेश्वर मंदिर कहाँ पर स्थित है

त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नाशिक जिले में स्थित है, यह नाशिक शहर से 18 किलोमीटर दूर ब्रह्मगिरी पर्वत पर समुद्री सतह से 3000 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है।

Where is Trimbakeshwar Temple Located in Nashik Maharashtra India

Location Map of Trimbakeshwar Temple in Nashik Maharashtra India on Google Map

त्रिंबकेश्वर जाने के मार्ग

त्र्यंबकेश्वर मंदिर जाने के 2 अलग-अलग रास्ते है। नाशिक से त्रिंबकेश्वर केवल 18 किलोमीटर दूर है और इस रास्ते का निर्माण श्री काशीनाथ धाटे की सहायता से 871 AD में किया गया था।
दुसरे आसान रास्तो में इगतपुरी-त्रिंबकेश्वर का रास्ता है। लेकिन इस रास्ते से जाते समय हमें 28 किलोमीटर की लम्बी यात्रा करनी पड़ती है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर का निर्माण किसने करवाया था

जैसा की मान्यता है की यह एक स्वतः प्रकट भगवान शिव का मंदिर है तो इसका निर्माण किसने करवाया का उत्तर मिलना अति दुस्कर है, है समय समय पर इस मंदिर का विस्तार और पुनरूद्धार कई राजाओ ने करवाया है, कहा जाता है वर्तमान समय से ५०० वर्ष पहले सबसे पहले इस मंदिर के निमित्त कुछ कार्य किया गया था फिर मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालासाहेब अर्थात नानासाहेब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार सन 1755 में शुरू हुआ था, जिस काम का अंत बाद 1786 में संपन्न हुआ।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर की विशेषता

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की सबसे अद्भुत और असाधारण बात तो यह है कि इसके तीन मुख(सर) हैं। एक भगवान ब्रहमा, एक भगवान विष्णु, और एक भगवान रुद्र। इस लिंग के चारों ओर एक रत्नजडित मुकुट रखा गया है जिसे त्रिदेव के मुखोटे के रुप में रखा गया है। कहा जाता है कि यह मुकुट पांडवों के समय से यहीं पर है। इस मुकुट में हीरा, पन्ना और कई बेशकीमती रत्न जुड़े हुए हैं। त्रयम्बकेश्वर मंदिर(Trimbakeshwar Temple) में इसको सिर्फ सोमवार के दिन 4 से 5 बजे तक दिखाया जाता है। इस मंदिर के पंचकोशी में कालसर्प शांती त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबली आदि पूजा कराई जाती है।
त्रयम्बकेश्वर मंदिर(Trimbakeshwar Temple) का भव्य इमारत सिंधु आर्यशैली का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर के भीतर एक गर्भगृह है, जिसमें प्रवेश करने के पश्चात शिवलिंग के सिर्फ आंख ही दिखाई देती है, लिंग नहीं।

Mahakaleshwar Mandir in Ujjain

भगवान शिव को समर्पित महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है, यह मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित है, इस विशाल मंदिर का वर्णन पुराणों में महाभारत में और कालिदास जी की रचनाओं में भी है, इस मंदिर पर बहुत से विधर्मी विदेशी अक्रान्ताओ ने हमला किया और कोशिश की इसे नष्ट करने की परन्तु फिर भी यह मंदिर अपनी भव्यता के साथ स्थित है।

Mahakaleshwar Mandir Kaha Par Hai

भगवान शिवजी का यह विशाल मंदिर उज्जैन में छिप्रा नदी के निकट बना हुआ है, इसकी भव्यता अपने आप में विशिस्ट है, निचे दिए गए मानचित्र में उज्जैन में स्थित मंदिर को दर्शाया गया है।

Mahakaleshwar Temple Ujjain History in Hindi

महाकालेश्वर मंदिर का निर्माण कब हुआ और किसने करवाया इसके बारे में, बस विद्वानों ने इसके बारे में सिर्फ इतना कहा है की ये अति प्राचीन एवं भव्य मंदिर है, इस मंदिर पर बहुत से आतताइयों ने हमले किये, इसे नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी इसकी भव्यता में कोई कमी नहीं आयी है, १२वी शताब्दी से १८वी शताब्दी तक उज्जैन में विधर्मिओं का शासन रहा और इस समय प्रत्येक मंदिर संकटग्रस्त था फिर भी जब यहाँ पर पुनः मराठो अन्य हिन्दू राजाओ का अधिपत्य हुआ तो इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया जिससे इसकी भव्यता में वृध्दि हुयी है।

Mahakaleshwar Temple Timings

From month Chaitra to Ashwin From month Kartik to Falgun
Bhasmarti early morning 4 am. Bhasmarti early morning 4 am.
Morning Pooja 7:00 To 7:30 am Morning Pooja 7:30 To 8:00 am
Mid-day Pooja 10:00 to 10:30 am Mid-day Pooja 10:30 to 11:00 am
Evening Pooja 5:00 to 5:30 pm Evening Pooja 5:30 to 6:00 pm
Aarti Shree Mahakal 7:00 To 7:30 pm Aarti Shree Mahakal 7:30 To 8:00 pm
Closing Time 11:00 pm Closing Time 11:00 pm

कालसर्प पूजा उज्जैन, कालसर्प दोष निवारण पूजा उज्जैन, सर्प दोष पूजा उज्जैन

Dashavatara Temple Deogarh Lalitpur Uttar Pradesh

Dashavatara Temple is a world famous temple dedicated to lord Vishnu and others in Uttar Pradesh, located in Deogarh a City of Uttar Pradesh under Deogarh City in Lalitpur District, India, Lat Long of Dashavatara Temple is 24°31′35.8″N 78°14′24.4″E and address of this temple is Dashavatara Temple, Deogarh village , Lalitpur district, Uttar Pradesh 284403, Dashavatara Temple is also locally known as ‘Sagar marh’, According to Alexander Lubotsky, Dashavatara Temple was built according to the third khanda of the Hindu epic Vishnudharmottara Purana, which describes the design and architecture of the Sarvatobhadra-style temple, the Dashavatara Temple was initially built by kings of Gupt Dynasty between late 5th-century and early 6th-century, or about 500 CE.

Facts about Dashavatara Temple Deogarh Lalitpur Uttar Pradesh

Name Dashavatara temple
City Lalitpur
Address Deogarh village , Lalitpur district, Uttar Pradesh 284403
Country India
Built by Not Known, but predicted that made during Gupta era
Came in existence 500 CE
Area covered in KM NA
Height NA
Time to visit 8AM-6PM
Ticket time NA
Ref No of UNESCO NA
Coordinate 24°31′35.8″N 78°14′24.4″E
Per year visitors 1 lakh
Near by Airport Khajuraho (IATA: HJR) and Bhopal (IATA: DBH)
Near by River Betwa River
Near by Railway Station Lalitpur

Where is Hawa Mahal, India

Hawa mahal is a world famous Heavenly Palace situated in Jaipur city of Karnataka, India, Lat Long of Hawa mahal is 17.4080° N, 78.4802° E and address of Hawa mahal, Maidan, BBD Bagh, Bijapur, Karnataka 700021, Hawa mahal is situated 350 kilometres South from Rajiv Gandhi International Airport, Hyderabad (Telangana), 8 KM from Bijapur railway station and 3 KM from Bijapur bus stand, Hawa mahal was built by Ali Adil Shah I in 1561.

Where is Hawa mahal Located in Bijapur Karnataka India

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Facts about Hawa Mahal

Name Gagan mahal
City Vijayapura
Address Gagan Mahal, DC Office Rd, Gopalpur Galli, Vijayapura, Karnataka 586101
Country India
Continent Asia
Came in existence 1561
Lat Long  
Area covered in KM 607 km
Height 17 metres
Time to visit 06:00 am – 06:00 pm.
Ticket time 06:00 am – 06:00 pm.
Ref No of UNESCO 5887
Coordinate 16°49’37″N 75°43’6″E
Per year visitors 500 year
Near by Airport Hyderabad airport
Near by River Anegundi

History of Hawa mahal in Hindi

गगन महल का इतिहास १६वी शताब्दी के इतिहास से जुड़ा हुआ है, या कर्नाटक के तत्कालीन विजयपुरम में बनाया गया था, जिसे आज बीजापुर के नाम से जाना जाता है, यह एक शाही महल था जिसमे दरबार भी लगता था, इसे १५६१ में तत्कालीन बीजापुर के शासक अली आदिल शाह प्रथम ने बनवाया था।

यह महल २७ एकड़ में बना हुआ है, २० मिटेर लम्बा है और १७ मीटर जमीन से ऊँचा है, गगन महल का प्रथम तल सही परिवार का निवास स्थान था

Arki Fort Solan Himachal Pradesh

Arki Fort is a world famous Historical Monument in Himachal Pradesh, located in Akri a City of Himachal Pradesh under Solan City in Solan District, India, Lat Long of Arki Fort is 31.152543°N 76.966374°E and address of fort is Arki Fort, Arki, Himachal Pradesh 173208, the fort was initially built by JAT king Raja Dayaram in 18th-century.

Facts about Arki Fort

Name Arki Fort
City Solan
Address Arki Fort, Arki, Himachal Pradesh 173208
Country India
Continent Asia
Came in existence 1803
Area covered in KM 1,840 km2 (710 sq mi)
Height  
Time to visit 9AM-5PM
Ticket time 9AM-5PM
Ref No of UNESCO  
Coordinate 27°36′N 78°03′E
Per year visitors  
Near by Airport Shimla Airport
Near by River Sengar and Karban

Where is Arki Fort Located in Solan Himachal Pradesh, India

Location of Arki Fort Located in Solan Himachal Pradesh, Arki Fort India on Google Map

History of Arki Fort in Hindi

अर्की का किला सोलन जिले के अर्की नगर में है, जो हिमाचल प्रदेश के जिलों में से एक जिला है, इस किले को कालांतर में महल भी कहा जाने लगा था इसकी आंतरिक भव्यता और सौंदर्य के कारण, इस किले को 1695 – 1700 के बीच में तत्कालीन शासक राणा पृथ्वी सिंह ने बनवाया था, १८०६ में इस किले को गोरखाओ ने अधिग्रहित कर लिया था और भगेल के राजा ने राणा जगत सिंह ने नालागढ़ में शरण ली थी, गोरखाओ ने इस किले का प्रयोग 1806 – १८१५ के बीच हिमाचल प्रदेश में सैन्य छावनी के रूप में प्रयोग किया था।

Hathras Fort Hathras

Hathras Fort is a world famous Historical Monument in Uttar Pradesh, located in Hathras a City of Uttar Pradesh under Hathras Fort City in Hathras District, India, Lat Long of Hathras Fort is 27°36′N 78°03′E and address of fort is Hathras Fort, Nagla Emliya, Hathras, Uttar Pradesh 204101, the fort was initially built by JAT king Raja Dayaram in 18th-century.

Facts about Hathras Fort

Name Hathras Fort
City Hathras
Address the town of Hathras in Uttar Pradesh
Country India
Continent Asia
Came in existence 1803
Area covered in KM 1,840 km2 (710 sq mi)
Height  
Time to visit 9AM-5PM
Ticket time 9AM-5PM
Ref No of UNESCO  
Coordinate 27°36′N 78°03′E
Per year visitors  
Near by Airport Kheria Airport
Near by River Sengar and Karban

Where is Hathras Fort Located in Hathras Uttar Pradesh, India

Location of Hathras Fort Located in Hathras Uttar Pradesh, Hathras Fort India on Google Map

History of Hathras Fort in Hindi

हाथरस का किला हाथरस जिले में है, जो उत्तर प्रदेश के जिलों में से एक जिला है, इसे १८वी शताब्दी में जाट राजा दयाराम ने बनवाया था।